झलक (Jhalak)
देखते देखते पूरा एक साल बीत गया
श्रृष्टि के नियमानुसार फ़िर काल जीत गया
जीवन है, लगी तो रहती ही है आनी जानी
इस ताल को वश में कर पाया नहीं कोई ज्ञानी
समय और संवेदना हृदय की पीड़ा हर नहीं पाते
कुछ रिश्ते किसी भी जतन भुलाए नहीं भुलाते
साये जो हट जातें हैं बड़ों के कभी सिर से
लाख चाहे किसी के मिल नहीं पाते फ़िर से
जीवन का चक्का तो निरंतर घूमता ही रहता है
हर पल हर दिन एक नई कहानी गढ़ देता है
पात्र बदल जातें हैं कुछ, कुछ बदले आतें हैं नज़र
मोह का भी क्या है नया बना लेता है अपना घर
दौड़ती फिरती है ये यादें मगर कुछ बेलगाम सी
बातों और आदतों में ढूँढ लेती हैं झलक उनकी
बीते दिनों के किस्सों से अपना मन भर लेता हूँ
मन हो भारी तो उनको बंद आँखों में भर लेता हूँजो तुम होतीं (Jo Tum Hoti)
अरसे से दिल कुछ भारी सा है
एक ख़याल दिमाग़ पे हावी सा है
माँ आज जो तुम दुनिया में होतीं
तो पूरे अस्सी साल की हो जातीं
तुम्हारे ना होने की आदत ही नहीं डल रही
इतनी यादें हैं तुम्हारी जो धुंधली नहीं पड़ रहीं
हर सुबह की वो नोंक-झोंक के चाय कौन बनाएगा
या इस बात पे बहस की क्या कभी देश में
राम राज्य आयेगा
कईं और भी मनसूबे किए थे जो बिखरे पड़े हैं
ख़त्म होने चलें हैं आँसू मेरे, नैनों में सूखे पड़ें हैं
इस बरस cake की मोमबत्ती नहीं तेरी याद में दिया जलेगा
वक्त को अब धीरे धीरे मेरा ये ज़ख़्म भी भरना पड़ेगायादें
कुछ यादें एक खलिश सी होती हैं बरसों दिल में सुलघ्ती रहतीं हैं दबती छुपती तो हैं मगर दहकती रहतीं हैं बीतते सालों का मरहम पा के भी दर्द देती हैं गुज़रा वक़्त सब कुछ भुला नहीं देता मन में बसा चेहरा धुन्दला नहीं देता तेरी मुस्कान दिल में अभी भी गूंजती हैं ये पलकें आज भी तुम को ढूँढती हैं तुम्हे याद कर यह आँखें दो बूँद और रो देती है नहीं लिखा था शायद साथ तुम्हारा होगी किसी खुदा की मर्ज़ी पर हमें नहीं है गवारा गलती तो खुदा से भी होती है यादें आ आ कर बस येही सदा देती हैं