Hindi Poetry | कविताएँ
पढ़ें सुधाम द्वारा लिखी कविताएँ। सुधाम के लेखन में श्रृंगार, करुणा, अधभुत आदि रसों का स्वाद सम्मिलित है।
ख़ामोशी (Khamoshi)
ख़ामोशी के खालीपन में
मैंने ख़ुद को खो दिया
तेरे इश्क़ के पागलपन में
अपनी हस्ती को ही डुबो दिया
तेरी यादों की बेइन्तहाई में
दिन और रैन की सुद को छोड़ दिया
बिछोड़े की इस तन्हाई में
मैंने अपनों से रिश्ता तोड़ दिया
तेरी बेवफ़ाई की इन बातों में
जाने कैसे ग़म से नाता जोड़ दिया
सजदे किये थे जिस रब की ख़ुदाई में
उसी ख़ुदा ने अपना रुख मोड़ दियाझलक (Jhalak)
देखते देखते पूरा एक साल बीत गया
श्रृष्टि के नियमानुसार फ़िर काल जीत गया
जीवन है, लगी तो रहती ही है आनी जानी
इस ताल को वश में कर पाया नहीं कोई ज्ञानी
समय और संवेदना हृदय की पीड़ा हर नहीं पाते
कुछ रिश्ते किसी भी जतन भुलाए नहीं भुलाते
साये जो हट जातें हैं बड़ों के कभी सिर से
लाख चाहे किसी के मिल नहीं पाते फ़िर से
जीवन का चक्का तो निरंतर घूमता ही रहता है
हर पल हर दिन एक नई कहानी गढ़ देता है
पात्र बदल जातें हैं कुछ, कुछ बदले आतें हैं नज़र
मोह का भी क्या है नया बना लेता है अपना घर
दौड़ती फिरती है ये यादें मगर कुछ बेलगाम सी
बातों और आदतों में ढूँढ लेती हैं झलक उनकी
बीते दिनों के किस्सों से अपना मन भर लेता हूँ
मन हो भारी तो उनको बंद आँखों में भर लेता हूँचिट्ठी (Chitthi)
मैं ख़ुश हूँ पापा
और मुझे मालूम है
के इस बात को जान
आप कई ज़्यादा ख़ुश होते
बीते चार सालों में
कुछ पाया और
बहुत कुछ खोया है
“जीवन है”, आप यही कहते
बड़ी वाली की बातों
छोटी की आदतों
आपकी बहू के अक्खड़पन में भी
आप मुझे नज़र आते हो
हर रोज़ मैं अपने आप को
आपके जैसे किसी साँचे में
ढालने की हिम्मत जुटाता हूँ
कुछ देर के लिए आप बन जाता हूँ
बातें तो बहुत और भी थीं
जो बताने सुनाने की सोची थी
आप पास ही हो कहीं शायद
क्योंकि इस ख़याल से अब भी सहम जाता हूँजो तुम होतीं (Jo Tum Hoti)
अरसे से दिल कुछ भारी सा है
एक ख़याल दिमाग़ पे हावी सा है
माँ आज जो तुम दुनिया में होतीं
तो पूरे अस्सी साल की हो जातीं
तुम्हारे ना होने की आदत ही नहीं डल रही
इतनी यादें हैं तुम्हारी जो धुंधली नहीं पड़ रहीं
हर सुबह की वो नोंक-झोंक के चाय कौन बनाएगा
या इस बात पे बहस की क्या कभी देश में
राम राज्य आयेगा
कईं और भी मनसूबे किए थे जो बिखरे पड़े हैं
ख़त्म होने चलें हैं आँसू मेरे, नैनों में सूखे पड़ें हैं
इस बरस cake की मोमबत्ती नहीं तेरी याद में दिया जलेगा
वक्त को अब धीरे धीरे मेरा ये ज़ख़्म भी भरना पड़ेगाआज (Aaj)
मेरे जज़्बात कुछ उलझे उलझे से हैं
मेरे हालात कुछ बदले बदले से हैं
जिस कलम की नोक से अल्फ़ाज़ बहते थे
आज उसके नीचे काग़ज़ कोरे कोरे पड़े हैं
ज़िन्दगी और जीने के मायने अलग हो चले हैं
पीरी के साथ ख़यालात अब कुछ सुलझ गए हैं
जो कभी रातों का सवेरा रोज़ किया करते थे
आज वो चंद पलों की फुर्सत से कतरा रहें हैं
मंज़िल और पड़ाव का फ़र्क़ धुंधला रहा है
सफ़र शायद अपने अंजाम तक आ रहा है
ये चश्म जो कभी साथी ढूँढते थे
आज वो साथ छूटने से घबरा रहें हैं
अब तो इंतज़ार ही मकसद बन चुका है
हर लम्हा अगले लम्हे के लिए बीत रहा है
जो कभी कल की फ़िक्र को धुएँ में उड़ाते थे
आज वो आने वाले कल को देख पा रहें हैंरोज़ाना (Rozaana)
आसान नहीं है ऐसा हो जाना
होता भी तो नहीं है ऐसा रोज़ाना
मिले, बैठे, फिर अपनी राह चले
इस से ज़्यादा कौन करता है भले
बात ये कुछ तीस बरस पुरानी है
चंद दोस्तों की ये अजब कहानी है
अलग भाव, अलग स्वभाव का व्यवहार था
आपस में यूँ घुल जाना अनूठा विचार था
लड़कपन की सूखी लकड़ियाँ तैयार थी
बस एक अल्लढ़ चिंगारी की दरकार थी
एक हॉस्टल के कमरे की ये दास्ताँ है
गहरी नींव पे खड़ा ये यारी का मकान है
कभी बिछड़े, कही झगड़े, कभी बस पड़े पड़े
कितने दिन ढले, रातें बीतें, कितने सूरज चढ़े
ज़िंदगी के कदम मीलों में कब कैसे बदल गए
बाल में सफ़ेद और वज़न सालों संग बढ़ गए
दूरी जो थी यारी को सिमटा मिटा ना सकी
नोक झोंक, छेड़ छाड़ की आग बुझी न रुकी
जीवन के कई उतार-चढ़ाव दोस्तों ने देखें हैं
साथ खड़े रहने, निभाने के क़िस्से अनोखे हैं
हर गुट, हर कहानी में कई किरदार होतें हैं
किसी सूरत में सेना, किसी में सरदार होते हैं
जो ना देखे ऊँच-नीच ना देखे दुनियादारी
कुछ ऐसी और लंबी चली है ये गाड़ी हमारी
अब तक सँभाली है बस यूँ ही चलानी है
बावजूद दूरी या मजबूरी पूरी निभानी है
क्यों की आसान नहीं है ऐसा हो जाना
और होता भी तो नहीं है ऐसा रोज़ानाएहसास (ehsaas)
आज दिल में एक भारी सा एहसास है
यादों से लदी हुई हर घड़ी हर सॉस है
वक़्त हर ज़ख़्म का मरहम है ऐसा कहते हैं
जाने क्यों मगर ज़िन्दगी के घाव ताज़ा ही रहते हैं
सजा के तो कई अरमान रखे थे यूँ लोगों ने
अब तो वो भी ग़ुम हो गए संजोए थे जिन्होंने
आँगन में धूप तो आज भी वही खिलती है
बारिश की बूँदे वही अटखेलियाँ करती हैं
पसंदीदा पकवानों में सिमटा उस रिश्ते का ज़ायक़ा है
बच्चों की किसी हरकत में अब होता आभास है
अकेले हो जाने का दर्द यूँ बस सम्भाला है मैने
दिल में हैं महफूज़ अज़ीज़ जहाँ रहना था उन्होंनेमाँ (Maa)
जाने कितनी दफ़ा कंधे पे तेरे सर रख के घंटों सोया हूँ मैं जाने कितनी दफ़ा तेरे आँचल तले बिलख़ के रोया हूँ मैं जाने कितनी दफ़ा मेरी छोटी सी छींक ने रात भर जगाया होगा जाने कितनी दफ़ा मेरी किसी नादानी ने तेरा दिल दुखाया होगा जाने कितनी दफ़ा मेरे भविष्य की चिंता तूने की होगी जाने कितनी दफ़ा मेरी एक पुकार पे तुम हर काम छोड़ भागी होगी जाने कितनी दफ़ा ये सोचता हूँ क्या मैंने तुम्हें गर्वान्वित होने का कभी मौक़ा दिया जाने कितनी दफ़ा ये सोचता हूँ क्या अलग करता कैसे मैंने तुम्हें यूँ अचानक खो दिया जाने कितने दफ़ा मैं ख़ुद को और लोग मुझको इसे होनी की चाल बताते हैं जाने कितनी दफ़ा यादें और ख़याल तेरे होने का एहसास दिलाते हैं जाने कितनी दफ़ा फिर दो आसूँ बहा तुम्हारा स्मरण करता हूँ जाने कितनी दफ़ा शीश झुका के माँ तेरे जीवन को नमन करता हूँ
न्योता (Nyota)
महज़ वक़्त के बीतने से किसीकी याद घटती नहीं बिछोड़े के काटे से रिश्तों कि डोर कटती नहीं दिलों में छपी तस्वीरें अंधेरों में ओझल होतीं नहीं विचलित मन की आँखों में नींद आसानी से समाती नहीं ख़यालों में गूँजती पुकार खुली आँख सुनाई देती नहीं ये जो ऋणों का बंधन है वो चुकाये उतरता नहीं कोई है उस पार गर जहाँ तो बिन बुलावे के कोई जा पाता नहीं फ़िलहाल कोशिश है खुश रखें और रहें दुःख अपना अपनों पे और लादा जाता नहीं जीवन है, हर धुन, हर रंग में रमना है, रमेंगें द्वार पे जब तक यम न्योता ले के आता नहीं
Humare Ram (हमारे राम)
Painting Credit & Courtesy: Sukhpal Grewal श्री राम कहो, रामचंद्र कहो कोई भजे सियाराम है कोई कहे पुरुषोत्तम उनको मानो तो स्वयं नारायण है कुछ तो बात होगी ही न उनमें की राम भावना युगों से प्रचलित है सहस्रों हैं वर्णन उनके, सैंकड़ो हैं गाथाएँ जो राम हैं हमारे वह तो हर कण में रमित हैं आज सज रहा शहर मोहल्ला सजी सजी हर गली भी है लहरा रही हनुमान पताका श्री राम लहर जो चली है जलेंगे आज दीप घर घर में पौष में मन रही दिवाली है प्रस्थापित होंगे राम लल्ला अवध में हर मन प्रफुल्लित और आभारी है पुनः निर्मित हो रहा है जो केवल मंदिर नहीं स्वाभिमान है यह किसी धर्म संप्रदाय की विजय नहीं धरोहर हैं हम जिसकी उस सभ्यता का उत्थान है हो सम्मान जहाँ हर नर का सम्मानित जहाँ हर नारी है प्रेरित हो जो राम राज्य से उस भारत की रचना ज़िम्मेदारी है राम आस्था राम विश्वास राम जीवन की सीख हैं राम रामत्व रम्य रमणीय राम इस संस्कृति के प्रतीक हैं कोई कहे पुरुषोत्तम उनको मानो तो स्वयं नारायण है श्री राम कहो, रामचंद्र कहो कोई भजे सियाराम है